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क्या मनुष्य पृथ्वी को बचाएगा, या पृथ्वी स्वयं को मनुष्य से बचाएगी?

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डाॅ कीर्ति शर्मा

The Biharijanseva : हम जिस धरती पर खड़े हैं, वह केवल मिट्टी, पत्थर और जल का ढेर नहीं है। वह एक जीवंत व्यवस्था है, सांस लेती हुई, संतुलन बनाती हुई, सहती हुई और आवश्यकता पड़ने पर स्वयं को सुधारती हुई व्यवस्था।
वेदों में पृथ्वी को केवल “भूमि” नहीं कहा गया, उसे “माता” कहा गया है,
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”
अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं।
यह केवल काव्य नहीं, एक गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य है। माता सहन करती है, पोषण देती है, रक्षा करती है; पर जब संतान मर्यादा भूल जाए, तो प्रकृति अपने ढंग से अनुशासन भी सिखाती है।

सन् 1970 में ब्रिटिश वैज्ञानिक जेम्स लवलॉक ने “गैया हाइपोथिसिस” का विचार दिया। उनका कहना था कि पृथ्वी कोई निर्जीव चट्टान नहीं है, जिस पर संयोग से जीवन उग आया हो। पृथ्वी स्वयं एक जीवंत प्रणाली की तरह काम करती है। उसके महासागर, वन, वायुमंडल, मिट्टी, तापमान सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और पृथ्वी अपने संतुलन को बनाए रखने का निरंतर प्रयास करती रहती है।
जैसे मनुष्य का शरीर गर्म होने पर पसीना बहाता है और ठंड लगने पर कांपता है, वैसे ही पृथ्वी भी अपने तापमान, जलचक्र, वायुमंडल और जीवन-चक्र को संतुलित करने का प्रयास करती है। जब कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ती है, तो वन उसे सोखते हैं। जब समुद्रों का रासायनिक संतुलन बिगड़ता है, तो समुद्री जीव और चट्टानी प्रक्रियाएं उसे नियंत्रित करने में लग जाती हैं। जब तापमान बढ़ता है, तो बादल, वर्षा, हवाएं और जलचक्र अपनी भूमिका निभाते हैं।

पृथ्वी करोड़ों वर्षों से अपना संतुलन स्वयं बनाती आई है बिना किसी संसद, बिना किसी सरकार, बिना किसी इंजीनियर और बिना किसी मानव अनुमति के।
उसने ज्वालामुखियों का प्रकोप देखा, हिमयुग देखे, उल्कापिंडों के आघात सहे, महासागरों के रूपांतरण देखे और पांच बड़े महाविनाशों के बाद भी जीवन को फिर से जन्म दिया। कभी यह पृथ्वी आग का गोला थी, आज वही पृथ्वी वन, नदियां, पर्वत, पशु, पक्षी, मनुष्य और चेतना का घर है।

फिर मनुष्य आया।
और पिछले दो सौ वर्षों में उसने पृथ्वी को माता नहीं, संसाधन समझ लिया। उसने धरती की छाती चीरकर खनिज निकाले और उसे विकास कहा। उसने पृथ्वी का रक्त निकालकर तेल कहा।
उसने नदियों को प्रदूषित किया और उसे औद्योगिक प्रगति कहा। उसने वनों को काटा और उसे नगरीकरण कहा। उसने आकाश को धुएं से भर दिया और उसे आधुनिकता कहा।
जब पृथ्वी का तापमान बढ़ने लगा, तब भी मनुष्य ने कहा “यह तो बहस का विषय है।”
यदि किसी मनुष्य को 102 डिग्री बुखार हो, तो कोई यह नहीं कहेगा कि मुझे तुम्हारे बुखार पर विश्वास नहीं है। पर मनुष्य ने पूरी पृथ्वी के बुखार पर बहस शुरू कर दी।

वेदों की दृष्टि में यह अज्ञान है। क्योंकि वैदिक जीवन-दर्शन प्रकृति से संघर्ष नहीं, प्रकृति के साथ समन्वय सिखाता है। यज्ञ का वास्तविक अर्थ केवल अग्नि में आहुति डालना नहीं है, बल्कि लेना और लौटाना है। प्रकृति से जितना लें, उससे अधिक उसे वापस देने का भाव ही यज्ञ है। आज मनुष्य ने यज्ञ-भाव छोड़कर केवल उपभोग-भाव अपना लिया है।
जहां ऋषि कहते थे—“त्यागेन भुञ्जीथा”, त्यागपूर्वक भोग करो, वहां आधुनिक मनुष्य कहता है “जितना मिल सके, उतना ले लो।”
यही संकट की जड़ है।
सत्य यह है कि पृथ्वी को बचाने की बात कुछ हद तक अहंकार भी है। पृथ्वी हमसे बहुत बड़ी है। वह हमसे पहले भी थी और हमारे बाद भी रहेगी। वह अपने को बचाने की शक्ति रखती है। प्रश्न यह नहीं है कि क्या पृथ्वी बचेगी। प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य बचेगा?
जब प्रकृति का संतुलन बहुत अधिक बिगड़ता है, तो वह सुधार करती है। पर उसका सुधार मनुष्य की सुविधा के अनुसार नहीं होता। वह चेतावनी-पत्र नहीं भेजती। वह कानून नहीं बनाती। वह भाषण नहीं देती। वह अपने नियमों से उत्तर देती है, कभी बाढ़ से, कभी सूखे से, कभी तूफानों से, कभी महामारी से, कभी भूख से, कभी समुद्र के बढ़ते जलस्तर से।
पृथ्वी क्रोधित नहीं होती; वह केवल संतुलन स्थापित करती है। पर मनुष्य के लिए वही संतुलन विनाश बन सकता है। हमने समुद्र के किनारे शहर बनाए और समुद्र से शिकायत की कि वह बढ़ क्यों रहा है। हमने नदियों के रास्ते रोके और बाढ़ को दोष दिया। हमने पर्वतों को काटा और भूस्खलन पर आश्चर्य किया। हमने वनों को मिटाया और फिर वर्षा-चक्र बिगड़ने पर चिंता की। हमने धरती को गर्म किया और फिर जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन करने लगे समस्या पृथ्वी की नहीं है। समस्या मनुष्य की दृष्टि की है।

वैदिक दृष्टि कहती है कि प्रकृति देवता है, अग्नि देवता, वायु देवता, वरुण देवता, सूर्य देवता, पृथ्वी माता। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रकृति के प्रत्येक तत्व को अंधविश्वास बना दिया जाए, बल्कि यह कि प्रत्येक प्राकृतिक शक्ति के प्रति श्रद्धा, संयम और उत्तरदायित्व रखा जाए।
जब वायु को देवता माना जाएगा, तो हम उसे जहरीला नहीं करेंगे। जब जल को वरुण का प्रसाद माना जाएगा, तो हम नदियों को नाला नहीं बनाएंगे। जब पृथ्वी को माता माना जाएगा, तो हम उसकी छाती को असीम लालच से नहीं चीरेंगे। जब अग्नि को यज्ञ का प्रतीक माना जाएगा, तो ऊर्जा का दुरुपयोग नहीं करेंगे।

आज आवश्यकता केवल पर्यावरण आंदोलन की नहीं है; आवश्यकता जीवन-दृष्टि बदलने की है। केवल पौधे लगाने से पृथ्वी नहीं बचेगी, जब तक मनुष्य का लोभ नहीं घटेगा। केवल कानून बनाने से प्रकृति नहीं बचेगी, जब तक उपभोग की अंधी दौड़ नहीं रुकेगी। केवल भाषणों से जलवायु नहीं सुधरेगी, जब तक जीवन में संयम, कृतज्ञता और यज्ञ-भाव नहीं आएगा।
धरती को हमारे दया-भाव की आवश्यकता नहीं है। उसे हमारे अहंकार से मुक्ति चाहिए।

सच तो यह है कि हमें पृथ्वी को बचाने के लिए नहीं, स्वयं को बचाने के लिए जागना होगा। पृथ्वी अपने को बचा लेगी। वह नए वन उगा लेगी, नए जीव पैदा कर लेगी, नए संतुलन बना लेगी। पर उस नए संतुलन में मनुष्य के लिए स्थान बचेगा या नहीं , यह हमारे आज के आचरण पर निर्भर करेगा।

इसलिए अब प्रश्न यह नहीं है ! क्या मनुष्य पृथ्वी को बचा सकता है?
प्रश्न यह है, क्या मनुष्य स्वयं को पृथ्वी की प्रतिक्रिया से बचा सकता है?
और इसका उत्तर केवल विज्ञान में नहीं, केवल राजनीति में नहीं, केवल तकनीक में नहीं; इसका उत्तर उस वैदिक चेतना में है जो कहती है
पृथ्वी माता है।
प्रकृति देवत्व है।
भोग मर्यादित होना चाहिए।
विकास संतुलित होना चाहिए।
और मनुष्य को स्वामी नहीं, संरक्षक बनकर जीना चाहिए।
यदि हम यह समझ गए, तो मानवता बचेगी।
यदि नहीं समझे, तो पृथ्वी फिर भी बचेगी
पर शायद हमारे बिना।

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