नई दिल्ली, 30 मार्च। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के समवेत सभागार में भारतीय ज्ञान परंपराः सनातनता और विश्व कल्याण विषय पर आठवां श्री देवेन्द्र स्वरूप स्मृति व्याख्यान संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रुप में महात्मा गांधी मोतिहारी केंद्रीय विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति व चौधरी चरण सिंह मेरठ विश्विद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. संजीव कुमार शर्मा उपस्थित रहे। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि मेरा परिचय देवेंद्र स्वरूप जी से एक पाठक के रूप में हुआ था। उन्होंने कहा कि भारत विश्व की सबसे पुरानी संस्कृति है। विश्व में सबसे पहले ग्रंथ लिखने वाले भारत की ज्ञान यात्रा बहुत लंबी है। भारत सत्य का अनुसंधान कर रहा है। भारतीय संस्कृति विश्व द्वारा वरणीय संस्कृति है। उन्होंने बताया कि भारत की जिज्ञासा, प्रश्न पूछने की परंपरा, सनातन ज्ञान परंपरा काफी पुरानी है।
आचार्य पिप्पलाद के संदर्भ में बताते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा प्रश्न पूछने और शास्त्रार्थ करने पर आधारित है। भारत की ज्ञान परंपरा ने दूसरे विचार को कभी प्रतिवाद नहीं समझा। उन्होंने बताया कि ज्ञान में और अधिक वृद्धि के लिए जिज्ञासा, प्रश्न पूछने की परंपरा आवश्यक है। उन्होंने महाभारत के यक्ष प्रश्न वाली घटना का वर्णन भी किया। प्रो. कुमार ने कहा कि श्रेष्ठ लोगों के मार्ग पर चलना चाहिए। उन्होंने बताया कि एकात्मकता का भाव भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण भाव है। हम वसुधैव कुटुम्बकम की मूल भावना को मानने वाले लोग हैं। सर्वे भवन्तु सुखिन: की कामना करने वाला सबके कल्याण का भाव रखने का विचार हमारी ज्ञान परंपरा में ही निहित है। विश्व की चिंता करने वाली एक मात्र संस्कृति भारतीय संस्कृति है। भारतीय ज्ञान परंपरा समावेशी के साथ भेदभाव रहित है। यह लोगों में सबको साथ लेकर चलने का भाव पैदा करती है। भारतीय ज्ञान परंपरा संवाद की परंपरा है। श्रीमद्भागवत के अठारहवें अध्याय का जिक्र करते हुए प्रो. कुमार ने कहा कि गीता का मूल तत्व वही है जो आपको उचित लगे उसे करें।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इं.गां.रा.क.केन्द्र न्यास के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय अध्यक्ष ने कहा कि गीता के अंदर लोकतंत्र विद्यमान है। क्योंकि अर्जुन कृष्ण से कई प्रश्न पूछते हैं और कृष्ण प्रत्येक प्रश्नों का उत्तर देते हैं। क्या भारत के राजनैतिक दल इस कसौटी पर खरे उतरते हैं यह प्रश्न किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली कहीं संस्थाओं में कैद होकर न रह जाए इसके लिए प्रयास किया जाना चाहिए। नई शिक्षा नीति में अनके संभावनाएं हैं। इस लंबी साधना में देवेन्द्र स्वरूप जी की पुस्तके सहायक सिद्ध होंगी।
कार्यक्रम के दौरान स्वागत भाषण एवं परिचय कलानिधि के विभागाध्यक्ष प्रो.(डॉ.) रमेश चन्द्र गौड़ ने दिया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 से यह स्मारक व्याख्यान आयोजित किया जा रहा है। इस दौरान प्रो. देवेन्द्र स्वरूप की डायरियों पर आधारित “भारत की ज्ञान यात्रा” पुस्तकों के पोस्टर का भी लोकार्पण किया गया। डायरियों का डिजिटाइजेशन हो चुका है और जल्द प्रकाशित भी हो जाएंगी। यह तीन खंडों की यह पुस्तकें सभी संस्थाओं, विद्यालयों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी ।

