नई दिल्ली। साहित्य अकादमी के गठन का उद्देश्य सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य के संवर्धन हेतु किया था लेकिन इसकी जटिल रचना, विचित्र चुनाव प्रक्रिया ने साहित्य अकादमी को ऐसे लोगों का जमावड़ा बना दिया जो साहित्य की बजाय भारतीय संस्कृति विरोधी विचार को देखकर निर्णय करने लगे। यह यक्ष प्रश्न है कि दुनिया के इतिहास में क्या कोई ऐसी दूसरी संस्था है जहाँ अपना कार्यकाल पूरा करने वाले सदस्य ही नए सदस्यों का चयन करते हैं। क्या यह कोई राजशाही है जहां राजा अपना उत्तराधिकारी स्वयं तय करें ?
जिस संस्था की रचना इतनी जटिल है, उसकी कार्यशैली भी अव्यवहारिक है । सुनने में यह है अच्छा लग सकता है कि साहित्य अकादमी सभी भारतीय भाषाओं के साथ समान व्यवहार करती है। प्रत्येक भाषा को एक सम्मान की बात सुनकर ताली बजाने वाले लोग समझते नहीं है या समझना नहीं चाहते कि डोगरी और बोडो बोलने वाली कुल जनसंख्या से भी अधिक हिंदी के लेखक हैं। अतः एक समान व्यवहार का जुमला उचित नहीं है। कुछ भाषाओं में पुरस्कार प्राप्त गली-गली हो और देश के लगभग सभी राज्यों और विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी भाषा के साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त साहित्यकारों को ढूंढना पड़ता है।
वह साहित्य आकदमी ही है जिसने देश की संविधान की आठवीं अनुसूची भाषाओं के अतिरिक्त कुछ बोलियां को अलग से सम्मान देने की परंपरा शुरू की। उसी का परिणाम है कि हिंदी को समृद्ध करने वाली बोलियों के मन में अलगाव के विचार पनपा। आज अनेक बोलियों के लोग संविधान में अलग दर्जा मांग रहे हैं तो उस पाप के लिए साहित्य अकादमी की कार्यशैली जिम्मेदार है । छोटी-छोटी बोलियों और लगभग 100 करोड़ के लोगों की भाषा हिंदी को समकक्ष रखने का विचार भाषा और संस्कृति के विखंडन को बढ़ावा देने का षड्यंत्र है । इसलिए सर्वप्रथम साहित्य अकादमी को लोकतांत्रिक बनाया जाए। साहित्य अकादमी को लोकतांत्रिक और निष्पक्ष बनाना इसलिए भी आवश्यक है ताकि उसकी प्रक्रिया पारदर्शी हो।
यह अब कोई छुपा रहस्य नहीं है कि साहित्य अकादमी पर लंबे समय से काबिज कांग्रेस-वामपंथ गिरोह ने मनमाने ढंग से चयन समिति का गठन और निर्णय की परंपरा आरंभ की। इस बार भी हिंदी पुरस्कार तय करने का जिम्मा जिन लोगों को दिया गया उनका एक विचारधारा विशेष में विश्वास तो अवश्य है लेकिन हिंदी साहित्य में क्या योगदान है यह बताने योग्य उनके पास कुछ नहीं है। ऐसे में साहित्य अकादमी के पुरस्कार ‘अंधा बाँटे रेवड़ी’ की तर्ज पर बांटे गए।
हमने साहित्य अकादमी द्वारा हिंदी की उपेक्षा का प्रश्न बार-बार उठाया है। साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय को भी पत्र लिखे लेकिन पत्र का उत्तर तो दूर पावती की सूचना भी प्राप्त नहीं हुई । इसलिए आज फिर दोहराना चाहता हूं, पुरस्कारों की प्रक्रिया को बदला जाए। हिंदी के लिए हर विधा में अलग पुरस्कार दिया जाए ताकि एक विचारधारा विशेष द्वारा किए गए अन्याय को दूर किया जा सके ।
जो लोग साहित्य अकादमी को स्वायत्त संस्था बताते हैं, वे यह भूलते हैं कि केंद्रीय साहित्य अकादमी की सभी गतिविधियां केंद्र सरकार द्वारा दिए जा रहे सैकड़ों करोड रुपए के अनुदान से चलती हैं। क्या अनुदान देने वाले को संस्था की गड़बड़ियां के प्रति आंखें मूंदे रखना चाहिए?
भारत लोकतांत्रिक देश है जहां बहुमत प्राप्त दल अथवा गठबंधन शासन चलाते हैं तो बहुमत की भाषा की अपेक्षा को कैसे उचित ठहराया जा सकता है? सरकार को तत्काल प्रभाव से समिति का गठन करना चाहिए जो साहित्य अकादमी की कार्यशैली से चुनाव प्रक्रिया तक की समीक्षा करते हुए सुधार के सुझाव दे।

