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नाटक आधीरात : यथार्थ, अपराध और व्यक्तिगत विकल्पों पर प्रकाश

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नई दिल्ली, 22 मार्च। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सम्मुख सभागार में नाटक आधीरात का मंचन किया गया। डॉ. शंकर शेष द्वारा रचित ‘आधी रात के बाद’ एक प्रभावशाली हिंदी नाटक है, जो एक जज के घर में घुसे चोर और जज के बीच रात के सन्नाटे में हुए संवाद पर आधारित है। यह नाटक कानून, न्याय व्यवस्था की खामियों, और सामाजिक वास्तविकता को उजागर करता है, जहाँ चोर खुद को बचाने के लिए जेल जाना चाहता है और अपनी कहानियों से जज के नजरिये को बदल देता है।
आधी रात को जज जयपाल सिंह के घर में एक चोर घुसता है। चोर डरा हुआ है क्योंकि उसने एक अमीर बिल्डर द्वारा किए गए पत्रकार की हत्या देखी है, और अब वह बिल्डर उसे मारना चाहता है।
चोर चाहता है कि पुलिस उसे पकड़ ले ताकि वह जेल में सुरक्षित रहे। पुलिस के न आने पर, चोर और जज के बीच लंबी चर्चा होती है। चोर जज को समाज की उन कड़वी सच्चाइयों और अपराध की दुनिया से रूबरू कराता है, जो अदालत की फाइलों से कोसों दूर हैं।
चोर अपनी कहानियों के माध्यम से न्याय व्यवस्था, पुलिस और अमीर-गरीब के बीच के अंतर पर तीखे सवाल उठाता है। यह संवाद जज को असहज कर देता है और उन्हें कानून के असली मायने सोचने पर मजबूर करता है।
अंत में, चोर के पास मौजूद सबूतों के आधार पर कार्यवाही की दिशा बदलती है। चोर एक अपराधी होने के बावजूद सच्चाई का सामना करता है। यह नाटक दर्शकों को यह सोचने पर छोड़ देता है कि असली अपराधी कौन है—कानून तोड़ने वाला या व्यवस्था में सेंध लगाने वाला।
यह नाटक मुख्य रूप से यथार्थवाद, अपराध, और व्यक्तिगत विकल्पों के इर्द-गिर्द घूमता है। नाटक की वस्त्र सज्जा सामान्य पर प्रभावी थी। वही धीमे धीमे प्रकाश में नाटक की कहानी को और गहरा बनाता है। कुल मिलाकर नाटक का मंचन बेतरीन था।

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