डॉ नेहा नैनवाल (सहायक आचार्य, डीयू)
भारत में विद्या और शिक्षा की परम्परा केवल ज्ञानार्जन की प्रक्रिया नहीं रही है, बल्कि संपूर्ण समाज के निर्माण का सशक्त माध्यम रही है। भारतीय दृष्टि में व्यक्ति को समाज से पृथक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ी चेतन सत्ता के रूप में देखा गया है। इसी कारण शिक्षा का उद्देश्य मात्र व्यक्तिगत उन्नति न होकर सामाजिक संतुलन, नैतिकता और लोकमंगल रहा है। समकालीन भारत में विद्यापीठों तथा पारम्परिक शिक्षा-प्रणालियों की प्रासंगिकता को समझना राष्ट्र के सांस्कृतिक एवं बौद्धिक पुनर्जागरण की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक हो गया है।
भारतीय शिक्षा की मूल दृष्टि : समाज, संस्कार और स्वावलम्बन
भारतीय ज्ञान-परम्परा में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्ति या आर्थिक उन्नति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चरित्र-निर्माण, आत्मानुशासन, आत्मबोध और लोकमंगल इसकी केन्द्रीय धुरी रहे हैं। गुरुकुल, पाठशाला, मठ, आग्रहारा और विद्यापीठ जैसे संस्थान इस व्यापक दृष्टि के सजीव केन्द्र थे, जहाँ ज्ञान, साधना और सेवा का समन्वय देखने को मिलता था।
प्राचीन तक्षशिला (7वीं शताब्दी ई.पू.) को विश्व का प्रथम संगठित विद्यापीठ माना जाता है, जहाँ चाणक्य, चरक और पाणिनि जैसे आचार्यों ने शिक्षा प्राप्त की। यहाँ 10,500 से अधिक छात्र विभिन्न देशों से अध्ययन हेतु आते थे और वेद, व्याकरण, आयुर्वेद, राजनीति तथा दर्शन जैसे विषयों का अध्ययन किया जाता था। यह इस तथ्य की पुष्टि करता है कि भारतीय विद्यापीठ जीवन के समग्र आयामों को समाहित करते थे, जो आज की बहु-विषयक शिक्षा का आधार हैं।
औपनिवेशिक काल में आयातित शिक्षा-मॉडल ने इन स्वदेशी संस्थाओं को हाशिये पर धकेल दिया। इसके परिणामस्वरूप शिक्षा और समाज के बीच का जैविक सम्बन्ध कमजोर पड़ा तथा अपनी ही ज्ञान-परम्परा के प्रति हीनभावना विकसित हुई। समकालीन भारत में यह प्रश्न पुनः प्रासंगिक हो उठा है कि क्या केवल पश्चिम-केन्द्रित, परीक्षा-मुखी और बाज़ार-उन्मुख शिक्षा-मॉडल से आत्मनिर्भर, संस्कारित और उत्तरदायी नागरिक तैयार किए जा सकते हैं।
विद्यापीठ : ज्ञान, साधना और मूल्य-जीवन का केन्द्र
‘विद्यापीठ’ शब्द मात्र विश्वविद्यालय का पर्याय नहीं है। यह शास्त्र, दर्शन, तर्क, साहित्य, संगीत, चिकित्सा और आध्यात्मिक साधना का समेकित केन्द्र रहा है। नालंदा और विक्रमशिला जैसे विद्यापीठों में वाद-विवाद के माध्यम से ज्ञान-शुद्धि की परम्परा थी, जिसे आधुनिक शोध-पद्धति की जड़ के रूप में देखा जा सकता है।
तक्षशिला जैसे विद्यापीठ ने चाणक्य को अर्थशास्त्र का सूत्रधार बनाया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि गुरु-शिष्य परम्परा से उत्पन्न ज्ञान राज्य-व्यवस्था और समाज-निर्माण का आधार बन सकता है। पाँचवीं शताब्दी में स्थापित नालंदा विद्यापीठ में लगभग 10,000 छात्र और 2,000 आचार्य थे तथा वहाँ लाखों पांडुलिपियों का संकलन था। बौद्ध दर्शन, तर्क और चिकित्सा जैसे विषयों के साथ-साथ वाद-विवाद के माध्यम से ज्ञान-शुद्धि इसकी केन्द्रीय पद्धति थी।
इन संस्थानों की विशिष्टता यह थी कि गुरु-शिष्य सम्बन्ध केवल कक्षा-कक्ष तक सीमित न रहकर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन, सेवा, संयम और साधना के रूप में अभिव्यक्त होता था। ज्ञानार्जन श्रुति-स्मृति, वाद-विवाद, मनन-निदिध्यासन और आत्मानुभूति की बहुस्तरीय प्रक्रिया के माध्यम से होता था, जो रटन्तु-आधारित शिक्षा से सर्वथा भिन्न थी।
धर्मपाल और देशज शिक्षा-प्रणाली : ऐतिहासिक आत्मविश्वास की पुनर्प्राप्ति
गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली की विशेषताओं को यदि आधुनिक शोध और ऐतिहासिक प्रमाणों के आलोक में देखा जाए, तो धर्मपाल द्वारा प्रतिपादित दृष्टि विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है। अपनी प्रसिद्ध कृति “The Beautiful Tree” में धर्मपाल ने औपनिवेशिक अभिलेखों के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि 18वीं शताब्दी तक भारत में ग्राम-आधारित, स्वावलम्बी और सामाजिक रूप से समावेशी शिक्षा-प्रणाली विद्यमान थी, जो केवल अभिजात वर्ग तक सीमित नहीं थी।
गुरुकुल और देशज विद्यालय स्थानीय समाज द्वारा संचालित थे, जहाँ शिक्षा का माध्यम मातृभाषा था और पाठ्यवस्तु स्थानीय आवश्यकताओं से जुड़ी हुई थी। धर्मपाल यह भी दर्शाते हैं कि गुरुकुलों में शिक्षा केवल साक्षरता तक सीमित न होकर नैतिक अनुशासन, सामाजिक दायित्व, श्रम-सम्मान और आत्मसंयम के मूल्यों को आत्मसात कराने की प्रक्रिया थी। शिक्षक और समाज के बीच गहरा सम्बन्ध था तथा शिक्षा का उद्देश्य प्रशासनिक नौकरी नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन और आत्मनिर्भर जीवन था। यह प्रणाली आधुनिक ‘सार्वजनिक शिक्षा’ की अवधारणा से कहीं अधिक सामुदायिक और सहभागी थी।
गांधी, अरविंद और विवेकानंद : स्वदेशी शिक्षा का वैचारिक विस्तार
महात्मा गांधी की नयी तालीम शिक्षा को श्रम, नैतिकता और स्वदेशी अर्थव्यवस्था से जोड़ती है। उनके लिए शिक्षा का अर्थ था—हाथ, हृदय और मस्तिष्क का समन्वित विकास। श्री अरविंद ने शिक्षा को समग्र मानव-विकास की प्रक्रिया माना, जिसमें शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक आयामों का संतुलित विकास हो। स्वामी विवेकानंद के अनुसार, “वह शिक्षा जो चरित्र न बनाए, व्यर्थ है।” उनके लिए शिक्षा आत्मविश्वास, साहस और राष्ट्र-निर्माण की शक्ति थी।
पारम्परिक शिक्षा-प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
भारतीय पारम्परिक शिक्षा-व्यवस्था की कुछ मूल विशेषताएँ आज भी अकादमिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय हैं—
• गुरु-शिष्य परम्परा पर आधारित घनिष्ठ वैयक्तिक मार्गदर्शन, जिसमें शिक्षक केवल पाठ्यवस्तु का नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि का भी संवाहक होता है।
• शिक्षा का आश्रम-जीवन से जुड़ाव, जहाँ अनुशासन, श्रम, सेवाकार्य, सामूहिक जीवन और स्वावलम्बन शिक्षण-प्रक्रिया का अविभाज्य अंग थे।
• पाठ्यक्रम की समग्रता, जिसमें अध्यात्म, दर्शन और नैतिकता के साथ-साथ भाषा, व्याकरण, तर्क, चिकित्सा, गणित, खगोल, शिल्प और कृषि-कौशल जैसे व्यावहारिक आयाम भी सम्मिलित थे।
• ‘दक्षिणा’ की अवधारणा, जो शिक्षा को शुद्ध वाणिज्यिक लेन-देन के बजाय कृतज्ञता और नैतिक दायित्व से जोड़ती थी।
धर्मपाल के विश्लेषण के आलोक में गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली की कुछ अतिरिक्त विशेषताएँ स्पष्ट रूप से उभरती हैं—
• समाज-आधारित स्वशासन: गुरुकुल राज्य-नियंत्रित नहीं, बल्कि ग्राम-समुदाय और स्थानीय संस्थाओं द्वारा संचालित होते थे।
• समानांतर और समावेशी पहुँच: शिक्षा केवल कुलीन वर्ग तक सीमित नहीं थी; शूद्र और कारीगर समुदायों की सहभागिता के भी पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं।
• जीवनोपयोगी पाठ्यक्रम: लेखन, गणना, व्यापारिक गणित, कृषि, शिल्प और नैतिक शिक्षा का समन्वय।
• मूल्य और कौशल का एकीकरण: नैतिकता और कौशल को अलग-अलग नहीं, बल्कि परस्पर पूरक माना जाता था।
पाल साम्राज्य (8वीं शताब्दी) के दौरान स्थापित विक्रमशिला विद्यापीठ बौद्ध तंत्र और दर्शन का प्रमुख केन्द्र था। अतीश दीपंकर जैसे आचार्य यहीं से तिब्बत गए। यह बहुलवादी विमर्श का प्रतीक था, जो आज की संवादिक शिक्षा-प्रणाली के लिए भी प्रेरक है। समकालीन शैक्षिक शोध यह संकेत देते हैं कि गुरुकुल-आधारित मूल्य-शिक्षा विद्यार्थियों में आत्मनियन्त्रण, सहानुभूति, प्रकृति-अनुकूल जीवनशैली और सामूहिकता जैसी प्रवृत्तियों को सुदृढ़ करती है, जो आज के प्रतिस्पर्धी और उपभोक्तावादी परिवेश में अत्यंत प्रासंगिक हैं।
समकालीन भारत में प्रासंगिकता
आज का भारत एक ओर वैश्विक अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी और डिजिटल क्रांति से जुड़ा हुआ है, तो दूसरी ओर अपनी सांस्कृतिक अस्मिता और स्वदेशी चिंतन की पुनर्प्रतिष्ठा का साक्षी भी है। नई शिक्षा नीति 2020 में समग्र शिक्षा, बहु-विषयकता, मातृभाषा-केन्द्रित शिक्षण, मूल्य-निष्ठा, कौशल-विकास और भारतीय ज्ञान-परम्परा के समावेशन पर विशेष बल दिया गया है, जो प्रत्यक्षतः पारम्परिक शिक्षा-दृष्टि से संवाद स्थापित करता है।
नालंदा ने बौद्ध दर्शन को वैश्विक स्तर पर पहुँच दी थी, जिससे यह प्रमाणित होता है कि विद्यापीठ केवल ज्ञान-उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैचारिक निर्यातक भी हो सकते हैं। इसी प्रकार, आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित श्रृंगेरी पीठम आज भी वेदान्त और उपनिषद्-आधारित साधना को समकालीन दार्शनिक और पर्यावरणीय विमर्श से जोड़ रहा है, जो परम्परा की अनुकूलन-क्षमता को दर्शाता है।
चुनौतियाँ और सीमाएँ
औपनिवेशिक शासन के दौरान स्थापित शिक्षा-मॉडल ने भारतीय पारम्परिक संस्थाओं को ‘अवैज्ञानिक’ या ‘अप्रासंगिक’ बताकर मुख्यधारा से लगभग अलग कर दिया। स्वतंत्रता के बाद भी विश्वविद्यालयी संरचना, मान्यता-मानदंड और वित्तीय प्राथमिकताएँ प्रायः पश्चिमी प्रतिमानों पर आधारित रहीं, जिनमें गुरुकुल या विद्यापीठ जैसे लचीले और मूल्य-केन्द्रित ढाँचों के लिए सीमित स्थान बचा।
इसके अतिरिक्त, यह धारणा व्यापक रूप से प्रचलित है कि पारम्परिक संस्थानों से प्राप्त शिक्षा रोजगारोन्मुख नहीं है, जबकि वास्तविकता यह है कि न्यायशास्त्र, भाषा-अनुवाद, संस्कृत अध्ययन, योग-आयुर्वेद, सांस्कृतिक उद्योगों और नीति-अध्ययन जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित मानव-संसाधन की माँग निरन्तर बढ़ रही है।
गुरुकुल-आधारित समाधान और हमारी आकांक्षाएँ
वर्तमान समय में भारतीय शिक्षा-व्यवस्था अनेक चुनौतियों से जूझ रही है जैसे शिक्षा का अति-वाणिज्यीकरण, मूल्य-शून्यता, रोजगार और शिक्षा के बीच बढ़ता अंतर, मानसिक तनाव, सामाजिक विघटन और प्रकृति से कटाव। इन चुनौतियों का समाधान केवल संरचनात्मक सुधारों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए शिक्षा की मूल दृष्टि का पुनर्पाठ आवश्यक है।
गुरुकुल परम्परा इन समस्याओं का वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करती है। मूल्य-आधारित शिक्षा, सामुदायिक जीवन, श्रम-संस्कृति, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और आत्मनियन्त्रण जैसे तत्व आज के विद्यार्थियों को मानसिक संतुलन, सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक स्पष्टता प्रदान कर सकते हैं। आधुनिक तकनीक और गुरुकुल मूल्यों के समन्वय से ऐसे संकर मॉडल विकसित किए जा सकते हैं, जो डिजिटल दक्षता के साथ मानवीय संवेदनशीलता को भी विकसित करें।
हमारी आकांक्षा ऐसी शिक्षा-व्यवस्था की है जो न तो अतीत में जड़ हो और न ही अंधाधुंध आधुनिकता की नकल करे, बल्कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की आत्मा को समकालीन आवश्यकताओं के साथ जोड़ते हुए आत्मनिर्भर, नैतिक और समाजोन्मुख नागरिकों का निर्माण करे।
नीतिगत एवं संस्थागत पुनर्पाठ की आवश्यकता
समकालीन भारत में शिक्षा-व्यवस्था को वास्तविक अर्थों में भारतीय स्वरूप देने के लिए विद्यापीठों और पारम्परिक संस्थानों के संदर्भ में बहुस्तरीय नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक हैं। इन्हें भारतीय ज्ञान-परम्परा और सांस्कृतिक अध्ययन के उच्च केन्द्रों के रूप में मान्यता, वित्तीय सहायता और शैक्षणिक स्वायत्तता प्रदान की जानी चाहिए। साथ ही, आधुनिक विश्वविद्यालयों और विद्यापीठों के बीच शैक्षणिक सेतु जैसे क्रेडिट-ट्रांसफर, संयुक्त डिग्री और शोध-सहयोग स्थापित किए जाने चाहिए।
स्वदेशी शिक्षा का प्रश्न केवल पाठ्यक्रम या पद्धति का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा, समाज और आर्थिक स्वाधीनता से जुड़ा हुआ प्रश्न है। धर्मपाल हमें ऐतिहासिक आत्मविश्वास देते हैं, गांधी नैतिक आधार, अरविंद चेतना का विस्तार और विवेकानंद राष्ट्र-निर्माण की ऊर्जा प्रदान करते हैं। गुरुकुल और विद्यापीठ इन चारों का समन्वित रूप हैं।
यदि भारत को सचमुच आत्मनिर्भर, संस्कारित और सामाजिक रूप से सुदृढ़ राष्ट्र बनना है, तो शिक्षा को बाज़ार से मुक्त कर समाज, संस्कृति और स्वदेशी अर्थदृष्टि से पुनः जोड़ना अनिवार्य है। गुरुकुल से विद्यापीठ तक की यह यात्रा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि नए भारत के भविष्य की धुरी है।

