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धार्मिक आस्थाओं के निवारण हेतु दिल्ली में बौद्धिक विमर्श

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नई दिल्ली । इंडिया स्लामिक सेंटर में मेवाङ विश्विद्यालय के तत्वाधान में आयोजित सर्वधर्म सम्भाव पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। आयोजन के प्रथम स्त्र की अध्यक्षा डॉ अशोक गाड़िया ने किया। मेवाड़ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ अशोक कुमार गाड़िया ने कहा कि इस्लामिक आक्रमणकारियों में इस्लाम की शिक्षा के अनुरूप कार्य किया। इस्लाम में आक्रमण की कोई जगह नहीं। जोतिशाचार्य प्रो पवन सिन्हा ने कहा कि ऊपर वाले ने धर्म नहीं बनाया। आज धर्म दुधारी तलवार बन गयी है, धर्म में सत्ता पाने केलिए विकृतियां आयी। भारत जिगना बलवती होगा दुनिया मे उतनी शांति बढ़ेगी।
मौलाना कल्बे रशीद रिज़वी ने कहा कि समस्या मज़हब और मजहबी नहीं है, मनुष्य रूपी जानवर है। भारत में नफरतों की हवा लाई हुई है, भारत की नहीं है।
एम डी थॉमस ने कहा कि धर्म मानवता पर हावी नहीं।होनी चाहिए । धर्म ने इंसान की जिंदगी बनने केलिए बहुत कुछ किया वहीं धर्म नद इंसानों को बर्वाद भी किया है।धर्म को लेकर कट्टर नहीं होना चाहिए। सभी धर्मो के मूल से।सीखने की जरूरत हैं।
योगभूषण महाराज ने कहा कि धर्म ही सनातन है। इस प्रकार की गोष्ठी की जरूरत आज बहुत है। हम भारतीय है जैन क्रिश्चियन बाद में हैं।
पंजाब सरकार में युवा सेवा विभाग के दिलवर सिंह ने कहा कि धर्मग्रंथ झूठा नहीं है उसपर जो विचार नहीं करता वह झूठा है। गुरुग्रंथ साहिब में सभी धर्मों का सम्मान करना बताया है।
तिबती संसद के सदस्य आचार्य ऐशी पहुंत्सोक जी ने कहा कि इसी धर्म का संकट नहीं देखा। धर्म किसी पर थोपा नहीं गया है। जो धर्म को नहीं जानते वही दुविधा फैलाते हैं।
दूसरे सत्र की शुरुआत फैज खान ने की मुस्लिम धर्म व ज़कात की आलोचना की।
अलीगढ़ विश्विद्यालय के प्रो रेहान अख़्तर ने कहा कि क़ुरान दूसरे धर्मों का आदर करना सिखाता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो गीता सिंह ने कहा कि हम सब एकत्र हुए हैं धर्म को समझने केलिए।
शौकत खान ने
कवि अरविंद मंडलोई ने कहा कि भारत में संवाद की परंपरा रही है आज संवादहीनता बढ़ी है जिससे एक दूसरे को जानने का मौका खत्म हो गया है।
डॉ उमर इलियासी ने कहा कि संघ ने मुझे श्री राम मन्दिर के प्राण प्रतिष्ठा में बुलाया यह मुसलमानों के लिए बड़ी बात थी। मदरसा और गुरुकुल के बीच संवाद होने चाहिए।
पत्रकार सुशील पंडित ने कहा कि हिंदू मुस्लिम एकता की बात गले नहीं उतरती। तजुर्बा कुछ और कहता है, इपर गौर किया जाना चाहिए। दिल्ली जो पाण्डवो की नगरी थी, पर आज कोई 100 साल का मंदिर नहीं है? जो चिंता का विषय है। जो कश्मीर में 36 साल पहले हुआ उसका रीबल्सन नहीं है। इस तीसरे सत्र की अध्यक्षता माननीय इंद्रेश कुमार जी ने की। यह सत्र बाकी सत्रों के मुकाबले बहुत सवालों भरा रहा। जिसमें मुस्लिम पैरोकारों पर कई सवाल उठाए जिनका जबाब उनके पास नहीं था। अंतिम स्त्र में पद्मभूषण श्री रामबहादुर राय, नजीब जंग, खुर्दशील आलम व डॉ महेश चंद शर्मा ने इस संदर्भ में अपनी अपनी बात रखी।

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