Headlines

प्राइवेसी और परिवार में बढ़ती दूरियाँ

Spread the love

कीर्ति शर्मा
(सामाजिक विचारक और लेखक)

आज के दौर में “प्राइवेसी” यानी निजता जीवन की एक अहम आवश्यकता बन चुकी है। तकनीक, बदलती जीवनशैली और बढ़ती व्यस्तताओं ने मनुष्य को पहले से कहीं अधिक व्यक्तिगत स्पेस की माँग करने वाला बना दिया है। यह बदलाव स्वाभाविक है, क्योंकि हर व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता और निजी दायरे की ज़रूरत होती है। मगर सवाल यह है कि क्या घरेलू प्राइवेसी की बढ़ती चाह रिश्तों में गर्माहट को ठंडा कर रही है? क्या इसने परिवारों में संवाद की जगह दूरी को जन्म दिया है?

प्राइवेसी की नई परिभाषा
पहले घर परिवार का केंद्र था, जहाँ सब साथ बैठकर बातें करते, निर्णय साझा होते और जीवन की खुशियाँ-दुःख बाँटे जाते। “मेरा” और “हमारा” के बीच कोई बड़ी दीवार नहीं थी। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं।

  • बच्चे अपने कमरे और गैजेट में बंद हैं। उनके कमरे में knock करके जाना पडता है।
  • युवा अपनी दुनिया सोशल मीडिया और आभासी मित्रों में तलाश रहे हैं। घर की किचन व भोजन के स्थान पर zomato, swiggy से मंगवाया खाना ही पसन्द है।
  • बड़े-बुज़ुर्ग अलग-थलग बैठ जाते हैं क्योंकि संवाद का पुल कमज़ोर हो चुका है।
    ऐसा लगता है मानो घर अब चार दीवारों के भीतर बसे अलग-अलग “प्राइवेट ज़ोन” का समूह बन गया है।

दूरियों के कारण

  • तकनीक की दख़लअंदाज़ी
    मोबाइल, इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने परिवार के साथ बिताए समय को कम कर दिया है। खाने की मेज़ पर भी बातचीत की जगह स्क्रीन की रोशनी हावी रहती है।
  • व्यस्त जीवनशैली
    कामकाजी लोग आफिस और ज़िम्मेदारियों में इतने उलझे हैं कि घर पर भी थकान और तनाव उन्हें परिवार से जुड़ने का अवसर नहीं देते।
  • निजी स्वतंत्रता की चाह
    नई पीढ़ी अपनी निजी सीमाएँ चाहती है। यह स्वतंत्रता स्वाभाविक है, लेकिन जब संवाद और सहभागिता घटती है तो यह परिवार में दूरी का कारण बन जाती है।
  • संवाद की कमी
    आज परिवारों में सबसे बड़ी चुनौती है, बातचीत का अभाव। लोग पास होकर भी एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।

यह प्रवृत्ति केवल दूरी ही नहीं, बल्कि अविश्वास और अकेलेपन को भी जन्म देती है।

  • बुज़ुर्ग स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हैं।
  • बच्चे अपनी भावनाएँ बाँटने से हिचकिचाने लगते हैं। और इस कारण डिप्रेशन में जाने की सम्भावनायें बढ जाती हैं।
  • पति-पत्नी के बीच भी आपसी समझ कम होती जाती है। और मतभेद बढ रहें हैं।

धीरे-धीरे परिवार, जो जीवन का सबसे सुरक्षित और अपनत्व भरा स्थान होना चाहिए, वही व्यक्तियों के बीच दीवार खड़ी करने लगता है।

ऐसी स्थिती में समाधान की राह यही है कि ,

  • संवाद को प्राथमिकता दें
    हर दिन कुछ समय परिवार के साथ केवल बातचीत के लिए निकालें। समस्याएँ, खुशियाँ और अनुभव साझा करने से रिश्तों की गर्माहट लौटती है।
  • डिजिटल डिटॉक्स अपनाएँ
    भोजन के समय और पारिवारिक आयोजनों में मोबाइल और टीवी से दूरी बनाएँ। तकनीक का प्रयोग ज़रूरी है, लेकिन उसकी अति परिवार को तोड़ सकती है।
  • संतुलन साधें
    प्राइवेसी का सम्मान करें, लेकिन सामूहिकता को भी महत्व दें। परिवार वह स्थान है जहाँ स्वतंत्रता और अपनापन दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
  • साझा गतिविधियाँ बढ़ाएँ
    परिवार के साथ खेल, यात्राएँ या सामूहिक कार्य, ये छोटे-छोटे पल रिश्तों में नई ऊर्जा भरते हैं।

प्राइवेसी जीवन का अधिकार है, लेकिन यदि यह परिवार के बीच दीवार बन जाए तो रिश्तों की नींव डगमगा जाती है। ज़रूरी है कि हम संतुलन बनाकर चलें, जहाँ निजी स्वतंत्रता बनी रहे, वहीं संवाद, अपनापन और सामूहिकता भी मज़बूत हों।
घर तभी घर कहलाता है जब उसमें केवल चार दीवारें न हों, बल्कि आपसी विश्वास, प्यार और साथ का उजाला भी हो।

“दीवारों में कैद मत हो जाओ,
दिलों के बीच दूरियाँ मत बढ़ाओ।
घर तभी अपना घर कहलाता है,
जब हँसी-खुशी का दीप प्रज्वलित हो जाता है।

निजता का सम्मान भी आवश्यक है,
पर स्नेहिल संगति का आलोक भी अनिवार्य है।
तकनीक बने न मौन की दीवार,
संवाद ही जीवन का हो आधार।

बुज़ुर्गों के अनुभव, बच्चों की किलकारी,
यही हैं घर की सच्ची समृद्धि और क्यारी।
आओ मिलकर फिर वही दीप जलाएँ,
संबंधों की गरिमा और ऊष्मा लौटाएँ।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Top