कीर्ति शर्मा
सेक्रेटरी जनरल, पीपल ऑफ इंडियन ओरिजिन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PIOCCI)
भारत आज अपनी आर्थिक यात्रा के एक अहम मोड़ पर खड़ा है। दुनिया की बड़ी और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत पर वैश्विक निवेशकों, बड़ी कंपनियों और फंड्स की खास नज़र है।
लेकिन एक बड़ी ताकत, जिसका पूरा उपयोग अभी तक नहीं हो पाया है, वह है भारतीय प्रवासी समुदाय। 200 से ज्यादा देशों में बसे लगभग 3.8 करोड़ भारतीय मूल के लोग आज आर्थिक पूंजी, अनुभव, पेशेवर क्षमता और वैश्विक नेटवर्क के लिहाज़ से बेहद मजबूत हैं।
फिर भी, भावनात्मक जुड़ाव और देशप्रेम के बावजूद, प्रवासी समुदाय और भारत के उद्योग, सरकार और प्रशासन के बीच एक “विश्वास की खाई” महसूस की जाती है। यह विचारधारा का मतभेद नहीं है, बल्कि अनुभव से जुड़ा मुद्दा है।
प्रवासी भारतीय, भारतीय उद्यमियों की मेहनत, जुझारूपन और सीमित संसाधनों में कामयाबी की क्षमता की सराहना करते हैं। दुनिया भर में भारतीय मूल के सीईओ और सफल स्टार्टअप संस्थापक भारत की प्रतिभा का भरोसा बढ़ाते हैं। लेकिन निवेश या साझेदारी के समय कुछ सवाल सामने आते हैं जैसे कि अनुबंधों में स्पष्टता की कमी, तय समयसीमा में बदलाव,
व्यक्तिगत संबंधों पर ज्यादा निर्भरता, खासकर एमएसएमई में कॉरपोरेट गवर्नेंस की कमजोरी।
प्रवासी निवेशकों के लिए केवल मुनाफा ही नहीं, बल्कि भरोसेमंद सिस्टम भी उतना ही जरूरी है।
भारतीय उद्योग को लागत के लिहाज़ से प्रतिस्पर्धी और निर्माण क्षमता वाला माना जाता है। लेकिन कुछ चिंताएं बनी रहती हैं: गुणवत्ता की निरंतरता,अंतरराष्ट्रीय मानकों और अनुपालन की तैयारी, लंबी अवधि तक भरोसेमंद आपूर्ति।
कई प्रवासी कारोबारी भारत से सामान लेना चाहते हैं, लेकिन बड़े स्तर पर साझेदारी को लेकर सतर्क रहते हैं।
सरकार की नीति अच्छी, पर ज़मीनी चुनौतियां हैं। हाल के वर्षों में सरकार की कई पहलें प्रशंसनीय हैं। मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया और पीएलआई योजनाएं भारत की वैश्विक छवि को मजबूत करती हैं।
लेकिन असली चुनौती ज़मीनी स्तर पर दिखती है: नियमों की अलग-अलग व्याख्या, राज्यों के बीच असमानता, घोषणा और असल परिणाम के बीच अंतर? प्रवासी अब नीतियों की घोषणा और उनके वास्तविक अनुभव में फर्क साफ़ तौर पर देखते हैं।
प्रशासन और प्रक्रिया: सबसे बड़ी चिंता और
सबसे ज्यादा सवाल प्रक्रियाओं को लेकर होते हैं जैसे कि फाइलों में देरी, कई स्तर की मंज़ूरियां, स्पष्ट और तेज़ शिकायत निवारण तंत्र का अभाव। इसलिए विदेशों में समयबद्ध और नियम-आधारित व्यवस्था के आदी प्रवासी उद्यमियों के लिए ये बातें परेशानी का कारण बनती हैं। पिछले कुछ वर्षो में हालात काफी बदले हैं। पिछले दस वर्षों में डिजिटलीकरण, पारदर्शिता और कारोबार की सहूलियत के मामले में भारत ने बड़ी प्रगति की है। लेकिन धारणा अक्सर बदलाव से पीछे रह जाती है।विश्वास केवल घोषणाओं से नहीं, अनुभव से बनता है।
पीपल ऑफ इंडियन ओरिजिन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PIOCCI) इस विश्वास की खाई को कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
- भरोसे को व्यक्तिगत से संस्थागत बनाना
प्रवासी निवेशकों और भारतीय कंपनियों के बीच व्यवस्थित जांच-पड़ताल, एमएसएमई और स्टार्टअप के लिए विश्वसनीयता प्लेटफॉर्म, अनौपचारिक सिफारिशों की जगह प्रक्रिया आधारित व्यवस्था। - नीति को सरल भाषा में समझाना
कई बार समस्या नीति की नहीं, समझ की होती है। सेक्टर आधारित गाइडेंस, अनुपालन में सहायता, ज़मीनी अनुभव को नीति निर्माताओं तक पहुंचाना। - तय नियमों वाला ढांचा: मानकीकृत निवेश मॉडल, मॉडल एमओयू और टर्म शीट
सेक्टर आधारित सहयोग मंच।
जब नियम स्पष्ट होते हैं, तो जोखिम घटता है और निवेश बढ़ता है। - एमएसएमई को “ग्लोबल रेडी” बनाना। इस के लिए बेहतर डाक्यूमेंटेशन, वित्तीय पारदर्शिता, अंतरराष्ट्रीय मानकों की तैयारी आवश्यक है। इससे उद्योग मजबूत होगा और प्रवासी भरोसा भी बढ़ेगा।
- सामूहिक आवाज़ उठाना
व्यक्ति की आवाज़ सीमित होती है, संस्था की आवाज़ प्रभावशाली।
प्रवासी व्यवसायों की समस्याओं को संगठित रूप से उठाना , इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों से संवाद, समयबद्ध और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग करना अनिवार्य बन जाता है। - केवल कार्यक्रम नहीं, परिणाम की जरूरत है।
सफल प्रवासी-भारत साझेदारियों को सामने लाना।नई पीढ़ी को जोड़ना, ठोस और मापने योग्य परिणामों पर ध्यान देना, भावना से आगे, व्यवस्था की जरूरत।
भारतीय प्रवासी भारत से दूर नहीं है। उन्हें भरोसे की जरूरत है जहां सिस्टम स्थिर हो
अनुबंधों का सम्मान हो, संस्थाएं व्यक्तियों से ऊपर हों।
भारत की वैश्विक उन्नति तब पूरी होगी, जब प्रवासी पूंजी, अनुभव और विश्वास को विकास की मुख्य धारा में जोड़ा जाएगा।
यह काम केवल भावनाओं से नहीं, मजबूत संस्थागत ढांचे से होगा।
PIOCCI इस दिशा में एक सेतु बन सकता है , शांत, पेशेवर और भरोसेमंद तरीके से।

