पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ घनश्याम महतो की सेवानिवृत्ति पर विभाग द्वारा सम्मान पूर्वक दी गई विदाई
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग द्वारा विभागाध्यक्ष डॉ कृष्णकान्त झा की अध्यक्षता में “एकल व्याख्यान सह सम्मान समारोह” का आयोजन किया गया, जिसमें एकल व्याख्यान कर्ता के रूप में सीएमबी कॉलेज, घोघरडीहा, मधुबनी के प्रधानाचार्य प्रो जीवानन्द झा, संस्कृत विभाग के वरीय प्राध्यापक डॉ आर एन चौरसिया, सेवानिवृत होने वाले पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ घनश्याम महतो, संस्कृत- प्राध्यापिका डॉ ममता स्नेही, पेंशन पदाधिकारी डॉ अताउर रहमान आदि के साथ ही कई शोधार्थी, विद्यार्थी एवं कर्मचारी ने भी विचार व्यक्त किया। कार्यक्रम का प्रारंभ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन से, जबकि समापन राष्ट्रगान से हुआ। संस्कृत भाषा में डॉ ममता स्नेही के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में स्वागत गान कुमकुम कुमारी एवं मुस्कान कुमारी ने प्रस्तुत किया। अतिथियों का स्वागत पाग, चादर एवं पुष्पमाला से किया गया। इस अवसर पर डॉ बालकृष्ण कुमार सिंह, सदानंद विश्वास, मणिपुष्पक घोष, सम्पा नन्दी, रवीन्द्र कुमार, जिग्नेश कुमार, ज्योति कुमारी, केशव कुमार, धर्मेन्द्र झा, श्वेता शिवानी, रूबी कुमारी, ब्यूटी कुमारी, मुस्कान कुमारी, प्रह्लाद कुमार, रिंकी कुमारी, दयानंद कुमार, गिरधारी कुमार झा, दीपक कुमार, अविनाश चौरसिया, मंजू अकेला, योगेन्द्र पासवान तथा उदय कुमार उदेश्य आदि उपस्थित थे।
प्रो जीवानन्द झा ने कहा कि भारतीय दर्शन में पुरुषार्थ तत्त्व की व्यापक विवेचना होती रही है। मानव सर्वाधिक श्रेष्ठ एवं विवेकशील प्राणी है, जिसका जीवन सप्रयोजन है। पुरुषार्थ चतुष्टय- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का हमारे जीवन में काफी महत्व है। इन चारों में कोई विरोध नहीं है, बल्कि ये एक- दूसरे के पूरक हैं। व्यष्टि एवं समष्टि के कल्याण के लिए पुरुषार्थ आवश्यक है। इनके संतुलित उपयोग से अपने जीवन के सभी लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकता है। उन्होंने डॉ घनश्याम महतो के साथ बिताए क्षणों को याद करते हुए भावुक शब्दों में कहा कि यदि इनसे खून मांगा जाए तो ये अपने प्राण देने को भी तैयार हो जाएंगे। विषय प्रवेश कराते हुए डॉ आर एन चौरसिया ने कहा कि भारतीय दर्शन में पुरुषार्थ मानव जीवन का मूल आधार है जो निष्क्रिय भाग्यवाद के विपरीत सक्रिय साधना एवं कार्य की वकालत करता है। ये मानव जीवन के चक्र को संतुलित कर व्यक्ति को समग्र विकास प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षक जीवन की दशा देने वाला दीपस्तंभ होता है जो छात्रों को माली या कुम्हार की तरह गढ़ता है। वह छात्रों को केवल पढ़ाता ही नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन के लिए तैयार करता है। अवकाश ग्रहण यात्रा का अंत नहीं, बल्कि नई दिशा में यात्रा की शुरुआत है। डॉ चौरसिया ने श्री महतो के उज्ज्वल, स्वस्थ, आनंदमय एवं दीर्घ जीवन की कामना की।
डॉ घनश्याम महतो ने 1985 में अपने योगदान से वर्तमान काल तक हुए परिवर्तनों की विस्तार से चर्चा करते हुए गुरु-शिष्य संबंध के बेहतर संबंध पर बल दिया। पेंशन पदाधिकारी डॉ अताउर रहमान ने कहा कि शिक्षक आजीवन शिक्षादान करता है। इस कारण वह कभी अवकाश ग्रहण नहीं करता। उन्होंने डॉ महतो के साथ अपने लंबे संबंधों की विस्तार से चर्चा की।
अध्यक्षीय संबोधन में डॉ कृष्णकान्त झा ने बिना किसी विवाद के अवकाश ग्रहण करने को बड़ी बात बताते हुए कहा कि अच्छे शिक्षक या कार्य करने वाले व्यक्ति का ही अवकाश ग्रहण के समय सम्मान किया जाता है। डॉ महतो मेरे भी काफी आत्मीय रहे हैं। इस अवसर पर डॉ घनश्याम महतो को पाग, चादर, माला, बुके घड़ी, डायरी, कलम, गीता, ब्रीफकेस आदि तथा उनकी धर्मपत्नी रूबी कुमारी को साड़ी, ब्लाउज, पाग, चादर आदि से विभाग के शिक्षकों एवं कर्मचारियों द्वारा सम्मानित किया गया। वही शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने भी डॉ महतो को विभिन्न तरह के उपहार देकर सम्मानित किया।


