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मां जानकी के पात्र से स्त्री विमर्श को नई दिशा प्रदान करता नाटक जनक-नंदिनी

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करुणा नयन चतुर्वेदी

नई दिल्ली, 21 जनवरी 2026। त्रिवेणी कला संगम में एक सप्ताह चलने वाले थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन डॉ. प्रकाश झा द्वारा निर्देशित नाटक जनक-नंदिनी का मंचन किया गया। मैथिली साहित्य, संस्कृति, कला और संगीत के शानदार मिश्रण से नाटक ने दर्शकों को काफी आनंदित किया। नाटक ने मां जानकी के जीवन के संघर्षों के माध्यम से पितृसत्तात्मक समाज से आज के दौर में स्त्रियों के प्रति हो रहे भेदभाव को समाज के सामने लाने का प्रयास किया है।
लोक मानस में मां सीता एक मौन स्वरूपा ही प्रतीत होती हैं तथा नाटक इसी को और विस्तार देने का काम करता है। मां जानकी जिन्होंने देवाधिदेव महादेव के पिनाक धनुष को उठाकर रख दिया, वही अपने पिता के स्वयंवर प्रतिज्ञा को फलित करने के लिए शादी के बंधन में बंधना स्वीकार करती हैं। पति धर्म के लिए प्रभु श्री राम के साथ वन में जाती हैं । फिर लोक में अपने सतीत्व को प्रमाणित करने के लिए अग्नि परीक्षा को पूरा करती हैं और एक धोबी के विशुद्ध अज्ञानता भरे प्रश्न पर जब श्री राम उनका परित्याग करते हैं तो भी वह उसपर प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती हैं। यह नाटक मां सीता के सतीत्व को मजबूती प्रदान करने का काम तो करता ही है लेकिन दर्शकों के सामने यह प्रश्न भी छोड़ने का काम करता है कि इस धरती पर मां जानकी जैसे पतिव्रता स्त्री के साथ पितृसत्तात्मक समाज ने कोई सहानुभूति नहीं दिखाई, वह समाज आज भी नहीं बदला है। आज भी सीता रूपी लड़कियां अपने माता पिता द्वारा जिस पुरुष से ब्याह दी जाती हैं, वह उस पति में ही अपने संपूर्णता को देखती हैं। वह चुपचाप मौन रहकर उनके सुख, दुख, सहचार्य की साथी बन जाती हैं और उनका स्नेह पाने के लिए कुछ भी सहने को तैयार हो जाती हैं।
आज भी पुरुषों के अपेक्षा स्त्रियां ज्यादा बंधनों में बंधी हैं। सामाजिक सम्मान को बचाए रखना केवल घर की लड़कियों के ही जिम्मे आता है। ऐसे ही प्रसंगों के माध्यम से निर्देशक प्रकाश झा ने दर्शकों को स्त्रियों के प्रति थोड़ा उदार और मानवीय स्थिति को ज्यादा मजबूती प्रदान करने का प्रयास किया हैं। साक्षी झा ने अपने शानदार अभिनय से लोगों का ध्यान आकर्षित किया।

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