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प्रेमचंद पातंजलि की पुस्तक व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण का सफ़र है : प्रो. बिजेन्द्र कुमार

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नई दिल्ली, 14 फरवरी। कांन्सिट्यूसन क्लब के डिप्टी स्पीकर हाल में प्रो. प्रेमचंद पातंजलि की पुस्तक ‘यमुना से गंगा तक मेरा कर्म पथ’ का लोकार्पण विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आलोक कुमार जी ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पंडित दिनदयाल उपाध्याय शेखावटी विश्विद्यालय, सीकर राजस्थान के कुलपति प्रो. अनिल कुमार राय के की।
इस अवसर पर आलोक कुमार जी ने कहा कि विश्व में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली आत्मकथा महात्मा गांधी की है। सत्य के प्रयोग में उन्होंने भारत में जो महत्वपूर्ण कार्य किया वह नहीं है। आत्मकथा जीवन से शिक्षा लेने के लिए होती है। हमारे जीवन के बहुत सारे काम रामचरित्रमानस से हो जाते हैं। उन्होंने जेएनयू में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, मोदी तेरी क़ब्र खुदेगी’ जैसे भाषण का जिक्र करते हुए कहा कि शिक्षक राष्ट्र निर्माण का कार्य करते है।
इस अवसर पर कुलपति प्रो. अनिल कुमार ने कहा कि आज भावुकता का क्षण है। किताब मेरे लिए रील है, आपके साथ बीते पिछले तीस साल का अनुभव है। यह केवल लेखक के उपलब्धियों का संकलन नहीं है संघर्ष का संकलन है। लेखक की उपस्थिति सभी क्षेत्रों में दिखती है। आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति आयी है। 1996 में अम्बेडकर कॉलेज में हिंदी पत्रकारिता व प्रयोजनमूलक हिंदी जैसे पाठ्यक्रम की शुरुआत हुई । जो विद्यार्थियों के लिए आज भी बहुत उपयोगी है। प्रो.पातंजलि ने हमेशा एक अलग लाइन खिंची है। एक नया रोड़ मैप तैयार किया और करने की सलाह देते थे । इस पुस्तक के बहाने विद्यार्थियों को बहुत कुछ सीखने और समझने का अवसर मिलेगा। उनके स्वयं के संघर्षों का दस्तावेजीकरण करना जरूरी था। यह बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है।

पुस्तक में लेखक ने कहा कि यह साहित्यिक रचना नहीं है। कठिन परिस्थियों से निकले एक आम आदमी के संघर्ष की कहानी है। मेरे शिक्षक मेरे गुरु भी थे और अविभावक भी थे, उन्होंने मुझे संस्कार दिए। मैंने किसी काम को छोटा बड़ा नहीं समझा अनुवाद से लेकर प्रशानिक कार्य तक किए । अम्बेडकर कॉलेज में हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत की जिसे प्रो. बिजेन्द्र कुमार और अनिल जी ने संभाला। पूर्वांचल विश्विद्यालय से जो विदाई हुई उस समय लोगों ने मुझे जो सम्मान दिया वो पल यादगार हैं। लेखक ने कहा उनका जीवन चुनौतियों से भरा रहा है।
इस मौके पर डॉ. सूरज ने कहा कि इनके साथ गुजरा 55 साल का सफ़र बहुत सुखद है। लेखक ने जमीन से आकाश तक का सफ़र तय किया है।
प्रो. बिजेन्द्र कुमार जी ने लेखक के साथ अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि जिस प्रकार पुस्तक का शीर्षक है वैसा ही इनका जीवन भी है। यह किताब पंचपरिवर्तन जैसी है या कहें कि व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण का सफ़र है।
किताबवाले प्रकाशन के निदेशक प्रशान्त जैन ने सभी अतिथियों का स्वागत किया तथा अंत में सबका आभार व्यक्त किया। इस मौके पर दिल्ली विश्वविद्यालय व अम्बेडकर कॉलेज के सैकड़ो शिक्षक, विद्यार्थी व कर्मचारी उपस्थित रहे।

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