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परिवार केवल खून के रिश्तों का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवन की पहली पाठशाला है। यहीं से मनुष्य सीखता है कि प्रेम, सहयोग, जिम्मेदारी और

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कीर्ति शर्मा
सामाजिक विचारक और लेखक

परिवार केवल खून के रिश्तों का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवन की पहली पाठशाला है। यहीं से मनुष्य सीखता है कि प्रेम, सहयोग, जिम्मेदारी और संस्कार क्या होते हैं। बदलते समय में परिवार की संरचना और उसमें निभाई जाने वाली भूमिकाएँ बदल रही हैं, इसलिए आज कुटुंब प्रबोधन यानी परिवार को समझने और सही ढंग से चलाने की ज़रूरत और भी अधिक है।
परिवार का महत्व
भारतीय संस्कृति में परिवार को हमेशा सर्वोपरि माना गया है। पहले संयुक्त परिवार आम थे, जहाँ तीन-चार पीढ़ियाँ साथ रहती थीं, सभी सुख-दुःख साझा होते थे और बड़े-बुजुर्गों का सम्मान सबसे ऊपर होता था। यह प्रणाली बच्चों और युवाओं को सुरक्षा, संस्कार और सामूहिक जीवन का अनुभव देती थी।
आज के समय में संयुक्त परिवारों की जगह छोटे या nuclear परिवारों ने ले ली है। जीवन-शैली में बदलाव और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चाह ने परिवार को नया रूप दिया है।
बदलते परिवार की चुनौतियाँ
नए दौर में परिवार कई चुनौतियों का सामना कर रहा है:

  • पति-पत्नी दोनों के काम करने से समय की कमी और आपसी तालमेल की दिक्कतें।
  • बच्चों और बुजुर्गों के लिए कम समय देना।
  • आर्थिक दबाव और बढ़ती महत्वाकांक्षाएँ।
  • रिश्तों में दूरी, तनाव और कभी-कभी टूटन।
    इन बदलावों से परिवार की मूल भावना, आपसी सहयोग और समझ, कमज़ोर होती दिखाई देती है।
    परिवार और सुख
    परिवार ही वह स्थान है जहाँ व्यक्ति सच्ची खुशी पाता है। बाहर चाहे कितनी भी मुश्किलें हों, घर में यदि प्यार, सहयोग और समझ हो तो जीवन संतुलित और सुखमय हो सकता है।
    परिवार में सुख बनाए रखने के लिए ज़रूरी है कि:
  • हर सदस्य की भावनाओं और जरूरतों का सम्मान हो।
  • बातचीत और संवाद हमेशा खुला रहे।
  • छोटे-छोटे क्षणों को मिलकर जीया जाए।
    बच्चों के लिए परिवार की भूमिका
    बच्चे वही बनते हैं जो वे घर में देखते और अनुभव करते हैं। यदि परिवार में प्यार, अनुशासन और मूल्य होंगे, तो बच्चा भी वैसा ही बनेगा। माँ-बाप को चाहिए कि वे बच्चों को सिर्फ़ पढ़ाई में नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला में भी मार्गदर्शन दें।
    बच्चों को सिखाना चाहिए:
  • मेहनत और ईमानदारी का महत्व।
  • दूसरों की मदद करने और बड़ों का सम्मान करने की आदत।
  • असफलता से डरने के बजाय सीखने का नजरिया।
    परिवार में भूमिका और संतुलन
    आज महिलाएँ भी घर की सीमाओं से निकलकर कामकाजी जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। इससे परिवार की जिम्मेदारियाँ साझा हो गई हैं। लेकिन कई बार काम और घर के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो जाता है।
    इसलिए परिवार के सभी सदस्यों को मिलकर जिम्मेदारियाँ बाँटना चाहिए, ताकि किसी एक पर बोझ न पड़े और घर का माहौल सकारात्मक बना रहे।
    परिवार का संगठन और संसाधन
    परिवार को बेहतर ढंग से चलाने के लिए थोड़ा संगठन और योजना बनाना ज़रूरी है।
  • समय का सही उपयोग करें।
  • आर्थिक खर्चों की योजना बनाकर चलें।
  • घर के काम और निर्णय मिलकर तय करें।
    जब परिवार एक संगठित ढंग से चलता है, तो हर सदस्य को सुरक्षा और संतुलन का अहसास होता है।

कुटुंब प्रबोधन का सार यही है कि परिवार केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था है जो हर सदस्य के विकास और सुख का आधार है। बदलते समय में भी यदि हम आपसी विश्वास, सहयोग और संस्कारों को बनाए रखें, तो परिवार हर चुनौती को पार कर सकता है।
एक सशक्त और संगठित परिवार ही एक मजबूत समाज और समृद्ध राष्ट्र की नींव रखता है।

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