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“जब कहावतें विलुप्त होती हैं, तो संस्कृति बोलना बंद कर देती है”

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डाॅ कीर्ति शर्मा

भारतीय समाज की भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं रही, बल्कि वह जीवन के अनुभवों, संस्कारों और दर्शन का जीवंत संग्रह भी रही है। इस भाषा की आत्मा रही हैं कहावतें और मुहावरे। “नाच न जाने आँगन टेढ़ा”, “ऊँट के मुँह में जीरा”, “घर का भेदी लंका ढाए” ये केवल वाक्य नहीं, बल्कि सदियों के अनुभव का संक्षिप्त निष्कर्ष थे।

आज दुर्भाग्य से ये कहावतें हमारी रोज़मर्रा की बातचीत से धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। उनकी जगह एक नई, त्वरित और सतही भाषा ने ले ली है, जिसमें “क्रिंज”, “सैवेज”, “लिटरली” जैसे शब्द तो हैं, पर वह गहराई नहीं, जो एक कहावत सहज ही दे देती थी। कहावतें वास्तव में लोकबुद्धि का “संक्षिप्त विज्ञान” थीं। वे बिना लंबी व्याख्या के जटिल जीवन परिस्थितियों को सरल बना देती थीं। एक सही कहावत न केवल बात को स्पष्ट करती थी, बल्कि उसमें हास्य, व्यंग्य और शिक्षाप्रद संकेत भी निहित होते थे।

आज संवाद अधिक शब्दों का हो गया है, पर अर्थ की गहराई कम हो गई है। इस परिवर्तन के पीछे सामाजिक ढांचे का बदलाव भी कम जिम्मेदार नहीं है। संयुक्त परिवारों के विघटन ने दादी-नानी के उस जीवंत “मौखिक विद्यालय” को समाप्त कर दिया, जहाँ कहावतें सहज ही जीवन का हिस्सा बन जाती थीं। डिजिटल युग ने संवाद को त्वरित तो बनाया, पर उसमें परंपरा का वह स्पर्श नहीं रहा। शिक्षा प्रणाली भी इस परिवर्तन में अपनी भूमिका निभा रही है। कहावतें अब पाठ्यक्रम में तो हैं, पर व्यवहार में नहीं। उन्हें परीक्षा के अंक तक सीमित कर दिया गया है, जीवन के ज्ञान के रूप में नहीं अपनाया जा रहा।

कहावत रहित भाषा सांस्कृतिक क्षरण का संकेत है। जब कहावतें विलुप्त होती हैं, तो हम केवल शब्द नहीं खोते , हम अपनी सोच की सरलता, अभिव्यक्ति की तीक्ष्णता और संस्कृति की पहचान भी खो देते हैं। समय की मांग है कि इस मौन क्षरण को पहचाना जाए। परिवारों में कहावतों के प्रयोग को पुनर्जीवित किया जाए, शिक्षा में उन्हें व्यवहार से जोड़ा जाए और सोशल मीडिया के माध्यम से “कहावत संस्कृति” को नया जीवन दिया जाए। साथ ही, बदलते समय के अनुरूप नई कहावतों का सृजन भी किया जाना चाहिए, ताकि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बना रहे।

अंततः, कहावतें भाषा की आत्मा हैं। यदि आत्मा ही खो जाए, तो भाषा केवल सूचना का माध्यम रह जाती है उसमें जीवन का रस, अनुभव की गहराई और संस्कृति की सुगंध समाप्त हो जाती है।

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