कीर्ति शर्मा
डायरेक्टर
देश भगत यूनिवर्सिटीज
पंजाब।
1947 का वर्ष केवल सत्ता-हस्तांतरण का वर्ष नहीं था; यह भारत की भौगोलिक, राजनीतिक और सामरिक संरचना तय करने का निर्णायक समय था। ब्रिटिश भारत दो भागों भारत और पाकिस्तान में बँट रहा था, परंतु 560 से अधिक रियासतें औपचारिक रूप से स्वतंत्र मानी जाती थीं। उन्हें यह विकल्प दिया गया था कि वे भौगोलिक, आर्थिक और राजनीतिक हितों को देखते हुए किसी एक डोमिनियन में शामिल हों।
राजस्थान की रियासतों में जोधपुर विशेष महत्व रखता था। विशाल क्षेत्रफल, पाकिस्तान से सटी लंबी सीमा, और पश्चिमी भारत में रणनीतिक स्थिति इन सब कारणों से उसका निर्णय केवल स्थानीय नहीं, राष्ट्रीय महत्व का था।
जोधपुर के युवा शासक हनवंत सिंह उस समय लगभग 23 वर्ष के थे। युवा ऊर्जा, शाही स्वाभिमान और स्वतंत्र निर्णय की आकांक्षा ये उनके व्यक्तित्व के प्रमुख तत्व थे। इसी पृष्ठभूमि में उनकी मुलाकात मुहम्मद अली जिन्ना से दिल्ली के इम्पीरियल होटल में हुई।
जिन्ना जानते थे कि जोधपुर यदि पाकिस्तान में शामिल हो जाता है, तो यह न केवल भौगोलिक विस्तार होगा, बल्कि भारत के पश्चिमी भाग में एक स्थायी सामरिक दबाव भी बनेगा। इसलिए उन्होंने असाधारण लचीलापन दिखाया।
इतिहासकारों के अनुसार, जिन्ना ने महाराजा के सामने एक कोरा कागज रखकर कहा कि वे अपनी शर्तें स्वयं लिख दें। यह प्रतीकात्मक कदम था, विश्वास का प्रदर्शन, पर साथ ही राजनीतिक कौशल का संकेत।
संभावित आश्वासनों में शामिल थे:
कराची बंदरगाह तक विशेष पहुँच,
हथियारों के आयात की स्वतंत्रता,
रेलवे और संचार पर नियंत्रण,
आंतरिक प्रशासन में लगभग पूर्ण स्वायत्तता,
यह प्रस्ताव आकर्षक अवश्य था, परंतु इसके दूरगामी परिणाम जटिल थे। एक हिंदू-बहुल रियासत का पाकिस्तान में विलय सामाजिक तनाव भी पैदा कर सकता था।
दिल्ली की चिंता: पटेल की दूरदर्शिता
जब यह सूचना दिल्ली पहुँची, तो भारत सरकार के गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और उनके प्रमुख सहयोगी वी. पी. मेनन तुरंत सक्रिय हुए।
पटेल रियासतों के एकीकरण के वास्तुकार माने जाते हैं। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था ।राजनीतिक विखंडन नवगठित भारत के लिए घातक सिद्ध होगा। यदि जोधपुर पाकिस्तान में जाता तो
राजस्थान की अन्य रियासतें असुरक्षित हो जातीं। पश्चिमी सीमा पर भारत की रक्षा-व्यवस्था कमजोर पड़ती।भविष्य में आंतरिक अस्थिरता का स्रोत बन सकता था।
पटेल की रणनीति कठोरता और संवाद दोनों का संतुलन थी। वे जानते थे कि युवा महाराजा को सम्मान और आश्वासन दोनों चाहिए।
तनाव का क्षण: ‘पेन-पिस्टल’ प्रसंग
वार्ताओं के दौरान एक नाटकीय घटना का उल्लेख मिलता है महाराजा ने अपनी पेन-पिस्टल निकालकर मेनन की ओर तान दी। यह घटना केवल आवेग का परिणाम नहीं थी; यह उस समय की असमंजस और दबाव का प्रतीक थी। मेनन ने संयम नहीं खोया। उन्होंने शांत स्वर में कहा कि निर्णय धमकी से नहीं, दूरदर्शिता से होंगे। यह संवाद-शैली ही अंततः निर्णायक सिद्ध हुई।यह प्रसंग दर्शाता है कि स्वतंत्रता के उस संक्रमण काल में भावनाएँ कितनी तीव्र थीं, और निर्णय कितने संवेदनशील।
अंततः पटेल ने स्पष्ट किया कि भारत महाराजा की गरिमा और आंतरिक अधिकारों का सम्मान करेगा, परंतु राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं होगा। 11 अगस्त 1947 को जोधपुर ने भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए। यह केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं थी; यह भारतीय संघ के निर्माण की एक महत्वपूर्ण ईंट थी।
जोधपुर का भारत में रहना कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण था। इसी कारण राजस्थान का एकीकरण संभव हुआ। पश्चिमी सीमा की सुरक्षा सुनिश्चित हुई।रियासतों के लिए स्पष्ट संदेश गया कि भारत संवाद और सम्मान के साथ, पर दृढ़ता से निर्णय करेगा।
सरदार पटेल की कार्यशैली ने यह सिद्ध किया कि राष्ट्र-निर्माण केवल भावनात्मक अपील से नहीं, बल्कि रणनीतिक सोच और धैर्य से होता है। 1947 के वे दिन केवल राजनीतिक समझौतों का समय नहीं थे; वे भारतीय एकता की कसौटी थे। जोधपुर का प्रसंग बताता है कि इतिहास अक्सर निर्णायक व्यक्तित्वों और शांत कूटनीति के संगम से बनता है। यदि उस समय थोड़ी भी चूक होती, तो आज भारत का मानचित्र भिन्न होता। इसलिए जोधपुर का निर्णय केवल एक रियासत का निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय अखंडता की आधारशिला था।

