नई दिल्ली। आर्य समाज करोल बाग में बसंती नवसंवत्सर यज्ञ एवं होली महोत्सव अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और सांस्कृतिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में आर्य बंधुओं, मातृशक्ति, युवाओं एवं बालकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। संपूर्ण परिसर वैदिक मंत्रोच्चार, पुष्प-सुगंध और राष्ट्रभक्ति के भाव से आलोकित दिखाई दिया।
प्रातःकाल वेद मंत्रों की पावन ध्वनि के मध्य बसंती नवसंवत्सर यज्ञ का विधिवत आयोजन किया गया। यज्ञ में उपस्थित श्रद्धालुओं ने राष्ट्र की उन्नति, समाज की समरसता, पर्यावरण संरक्षण तथा विश्व शांति के लिए आहुति अर्पित की। विद्वान आचार्यों ने अपने वैदिक संदेश में नवसंवत्सर को आत्मचिंतन, आत्मनवीनता और संकल्प-शक्ति का पर्व बताते हुए कहा कि नया वर्ष केवल पंचांग का परिवर्तन नहीं, बल्कि विचार, व्यवहार और संस्कार के नवीनीकरण का अवसर है। गणेश शास्त्री ने संबोधित करते हुए कहा कि वैदिक संस्कृति का मूल तत्व है — सत्य, सेवा और संयम। यदि समाज इन मूल्यों को अपनाए तो परिवार, राष्ट्र और विश्व में स्थायी शांति और प्रगति संभव है।
यज्ञ के उपरांत आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने समारोह को जीवंत और प्रेरणादायक बना दिया। बच्चों एवं युवाओं द्वारा प्रस्तुत भजन, देशभक्ति गीत एवं वैदिक नृत्य-प्रस्तुतियों ने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया। कई प्रस्तुतियों में भारतीय संस्कृति, नारी शक्ति और सामाजिक एकता का संदेश प्रभावशाली ढंग से दिया गयाप्रधान कीर्ति शर्मा ने अपने उद्बोधन में होली के आध्यात्मिक एवं सामाजिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि मन के विकारों द्वेष, ईर्ष्या, अहंकार और कटुता को त्यागकर प्रेम, सौहार्द और भाईचारे को अपनाने का संदेश देता है। होली हमें यह स्मरण कराती है कि असत्य और अधर्म चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न प्रतीत हों, अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है।
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रही “फूलों की होली”, जिसमें सभी उपस्थित जनों ने परंपरागत एवं सादगीपूर्ण ढंग से पुष्प वर्षा कर एक-दूसरे को शुभकामनाएँ दीं। रंगों के स्थान पर पुष्पों से होली खेलने का यह अनूठा आयोजन पर्यावरण संरक्षण और भारतीय संस्कृति के मर्यादित स्वरूप का सुंदर उदाहरण बना। पूरा परिसर पुष्पों की सुगंध और आत्मीयता की भावना से सराबोर हो उठा।
समारोह का मंच संचालन श्री कमल आर्य ने अत्यंत प्रभावशाली, संतुलित एवं मर्यादित शैली में किया। उनके सुसंगठित संचालन से कार्यक्रम सुव्यवस्थित, प्रेरक एवं गरिमामय बना रहा।
अंत में दीप्ति टण्डन ने सभी उपस्थित जनों का हृदय से आभार व्यक्त करते हुए समाज में वैदिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार, सामाजिक समरसता की स्थापना तथा राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का संकल्प दोहराया।
यह आयोजन परंपरा और आधुनिकता के सुंदर समन्वय का सशक्त उदाहरण सिद्ध हुआ तथा सामाजिक एकता, सांस्कृतिक चेतना और वैदिक जीवन-दृष्टि को सुदृढ़ करने की दिशा में एक प्रेरणादायक कदम बना।

